मंगलवार, 4 नवंबर 2014

कोदो आ पढ़ाई

कोदो आ पढ़ाई
नमस्कार! 
हालिचालि ठीक बा. तिहवार आ मेला के दिन बा. गांवन में कटिया आ बोआई के समय में लोग के संवठ नईखे मिलत बाकी सब कुछु एही में चलत बा. काल्हि पुर्नवासी की मेला के बटोर ह आ परसो नहान. ट्रेन, बस आ जीप-कार की जमाना में बटोर अब ओतना नईखे होत बाकी जेकरा सबेरे नहायेके बा ऊ त जईबे करी. कुछु लोग मेलहा होला ऊ मेला में जरूर जाला चाहे नियरा की मेला जा चाहे दूर की मेला. हमरी गांव से कुछु दूर पर सरयू नदी की किनारे भागलपुर में नहान के मेला अबो लागेला. बचपन में गांव से मुन्हारे पैदले चलि के बिहान होत होत नहान. नहान की बाद कुछु छू के (दान देकर) जिलेबी के जलपान आ घर खातिर ललकी हरियरकी चीनी के बर्फी देखि के जीव ललचि जाई. लकठा, गट्टा आ मिठाई ले के कुछु घूमि घामि के लोग गांव की ओर चली. रस्ता भर बहस होई आ लईकन  से भी पूछि-ताछ होई. जे बहस में कमजोर परी ओके लोग कही " कोदो दे के पढ़ले बाड़" का.

कोदो सूखा क्षेत्र में पैदा होवे वाला घास जईसन अन्न ह जेकर गोल-गोल चाउर होला. ओ जमाना में कोदो सबसे सस्ता अनाज मानल जात रहे. लोग जेके ना तेके इहे कहे कि कोदो देके पढ़ले बाड़ का. धनी लोग धन की बल पर अपनी लइकन के पढ़ाले आ ई ना चाहे कि सब केहु पढ़ि पावे. इ मानसिकता अब्बो बनल बा जेकरी लगे जेतना कमाई बा ओकर लईका ओतने बड़्हन स्कूल में पढ़ेला. जब विदेसन से दबाव पड़े लागल आ अनुदान मिले लागल त स्कूल खुले लगलन स बाकी सरकार अबले अपनी बल पर सबके पढ़ाई के व्यवस्था नईखे क पवले. नेता लोग स्कूल खोलि के वोट के जोगाड़ करेला आ व्यवसायी लोग विज्ञापन की खातिर स्कूल खोले लागल. बाद में अनुदान आ घपलेबाजी से कमाई होखे लागल त अब शिक्षा एगो व्यवसाय के सेक्टर हो गईल बा पईसावाला लोग अब साबुन, तेल, पानी, शिक्षा आ चिकित्सा सबसे कमायेके हैसाब लगाके ध ले ले बा. देश के पूंजीपति लोग शिक्षानीति भी बनावत बा. विदेशी लोग भी इहां आके लोगन के गाढी कमाई लूटे तैयारी क ले ले बा.

ई सब ए लिये होता कि भारत के लोग ई मानि के चलता कि लईका के पढ़ावल ओकर निजी काम ह. एमे सरकार के कुछु काम नईखे. सरकार जेतना पैसा जहां भी खर्च करता उ देश की सवा सौ करोड़ जनता के पिसा ह. जब ऊ पैसा सबकर ह त देश की हर नौनिहाल के ई अधिकार ह कि ओकरा में जवन विशेषता बा ओके विकास के अवसर मिलेके चाही जेसे समाज के लाभ हो सके.

सबके एक समान शिक्षा के व्यवस्था से साम्यवाद या समाजवाद से कुछु लेबे देबे के नईखे. ई लोकतंत्र  के कसौटी ह कि सबकी पढ़ाई आ स्वास्थ्य के व्यवस्था सर्वजनिक धन यानी कि राजकोष से होखे. नवका अर्थशास्त्री लोग सबके शिक्षा आ स्वास्थ्य की पक्ष में नईखे. दुख आ सोचेवाली बाति ई बा कि जे तनिको कमाता ऊ सरकारी स्कूल से अपनी लईका के हटा लेता. सवा सौ करोड़ की देश के सब लईकन की प्राथमिक  शिक्षा के ईहालि बा कि ना स्कूल बा, ना मास्टर बाने ना किताब ना कापी . बड़ा बड़ा योजना के नाम बताइ लोग जब ई लेख पढ़ी बाकी बड़्की बिल्डिंग आ फीसि वाला स्कूल के मास्टर लोग प्रशिक्षित नईखे.

चालीस साल से देश में खाली कुर्सी के लड़ाई चलता. देश की गरीब आ मध्यवर्ग के हितैसी बनि के उनुकी पिठि में छूरा भोंकाता. 

त देश के सब लोगन का ई सोचे के चाही कि सब लईकन के पढ़ेके आ बढ़ेगे अवसर तब्बे मिली जब सबके हर स्तर के शिक्षा के नि;शुल्क  व्यवस्था जनता माने सरकार की हाथ में होई.

एही खातिर जनता के जगावे आ सरकार के खबरदार करे खातिर दू नवम्बर से ईरोम शर्मिला की लग से आ बाकी  देश की सगरी ओर से शिक्षा अधिकार मंच के शिक्षा संघर्ष यात्रा २०१४ चलि के चार दिसम्बर के भोपाल पहुंची.

त देश सगरी लोगन का सोचे के चाही की भारत के सवा करोड़ जनता की देश के नौनिहाल कबले भीखि, कर्जा , दान आ दूसरे की आसरा पर पढ़िहें. अब पढ़ाई खातिर गहना आ खेत ना बिकाये के चाहीं. अब मां, पिता, बहन या भाई की कमाई ना तय करी की लईका का पढ़ी. लईका के योग्यता, क्षमता तय करी की ऊ का पढ़ी.

नमस्कार!
फेरू भेंट होई.