वसंत पंचमी
नमस्कार!माघ महीना के शुक्ल पक्ष के पंचमी के वसंत पंचमी कहल जाला. देहात में वसंत पंचमी के नेवान कहल जात रहल ह. पहिले की ज़माना में जब जौ के खेती होखे त नेवान की दिन ले जौ गदरा जात रहे आ केराव ( मटर हरियरका जवना के छिलका झुर्रीदार होत रहे ओके देशी केराव भी कहल जात रहे , कबिली केराव सफ़ेद मटर के कहल जात रहे आज कल त हरा मटर के एईसन किसिम चलल बा जवना में बारह गो से अधिका दाना होता.) भी गदरा जात रहे. नेवान की दीने घर दुआर गोबर से लीपल जात रहे ( एगो भोजपुरी गीत के मुखड़ा ह गायी की गोबरा से अंगना लीपवलों..). सांझी की बेरा केहू जा के खेत में से पांची गो जौ के बाली तूरि के ले आई. वो बालिन के भूजि के गुड़ आ घी में मीसि के घर भरि के बाँटल जाई. नवका फसल के पहिला व्यंजन.
एकरी बाद केराव आ जौ के भूजि के ओखरी में खानि के हापुस बना के खाईल जात रहे. अधपका केराव या रहिला (चना) के डंठल समेत दुगो रहर (अरहर ) की डंठल पर धके नीचे से ऊखी (गन्ना) के पतई चाहे सूखल घास धके आगि लगा दिहल जाई. धीरे धीरे सब छिम्मी (फली पाकी के गिरि जात रहे. एके होरहा कहल जाला ई सोंह ( सोंधा) वंजन अब दुर्लभ बा . रहिला के होरहा त कुछु लोग ढ देत रहे आ ओके बरसात में खात रहे.ओतनी घरी दूसरे की खेत में से केराव उखारी के होरहा लगा के खाए वाला लईकन कमी ना रहे.
वसंत पंचमी की चर्चा में बाति होरहा पर चलि गईल. वसंत पंचमी की दीनें ही सम्मति गडात रहे. अब्बो गाडल जाला. सम्मति गाड़े के निश्चित स्थान होला. एगो बड़हन बांस की पुलुई पर जौ आ तीसी बान्हि के गाडी दीहल जाई. ओकरी चारु ओर पतई बिटोरी के राखी दीहल जाई. वसंत के गाना चौताल गावल जाई. होलिका दहन जौना के कहल जाला ओही दीने ई सम्मति फुका जाई. शहर के होलिका दहन भोजपुरी के सम्मति फूकल एक्के चीजु ह. वसंत पंचमी से लेके फागुन की पुर्न्वासी ले रोज गाव के गवैया लोग आ सुनवैया लोग रोज सम्मति लगे जुटी के पतई बिटोरी चौताल गाई. कहियो कहियो लोग ओईजू से उठी केहू की दुआर पर आके भी गाना गाई.
ऐतरे देहात की लोगन के वसंत फागुन ले चली फेरू गेहूँ रहर पाकी जाई आ कटिया दवरी के सीजन आ जाई. ई कुलि बखान हम सन साठी से पैंसठ की बीच के कर तानी. आजु काल्हि खेती में नया तकनीक मनोरंजन के नया तकनीक आ गईल बा मोबाइल गाँव गाँव में बा. टी वी बा मोटर साइकिल बा मोटर बा पक्का मकान बा. हैण्ड पम्प कूना सुखी गईलें स. हर हरवाह कटिया मजूरी की जगह टेक्टर कम्बाइन ट्यूबवेल के जमाना बा.
अब अखबार आ टी वी गाँव गाँव में वैलेंटाइन डे के पहुंचा देले बा. रोज राजनीति के चर्चा बा. अब गाँव के दलित उनईखे जौन पहिले रहे. बदलत ज़माना की साथ सोच भी बहुत बदली गईल बा. अब झगड़ा दलित आ सवर्ण के नाहोके जातिवादी राजनीति के बा. गाँव में भी बफे के खाना बा सब एके साथे खा लेता. जेकरा जौन मन करता तौन पहिरता. लड़ाई सामाजिक से ढेर राजनीतिक हो गईल बा.
देहाते में तब छोट लईकन के अपनी दुनु पर सुता के लोग घुघुआ माना खेलावत रहल ह. आ अंत में दूनू पर ऊपर कके लईका से कहल जात रहल ह नई भीति उठेले पुराण भीति गीरेले ह हा हा ....
नया बनत रही पुराना बिगड़त रही भोजपुरी में नया नया शब्द आ पुराना होरहा गुम हो जाई. उपयोगी रही तुने बची बाक़ी सब ख़तम हो जाई.
बाक़ी फेरु कब्बो.
नमस्कार.