रविवार, 14 नवंबर 2010

ग्लोबल छठ

नमस्कार !
हालिचाली ठीक बा नू !
छठी के तिहवार निमने निमने बीती गईल. चैनल से लेके अखबार ले छठी की समाचार से पटी गईल रहल ह. बाजार, ट्रेन, बस, सड़क सब जाम हो गईल रहल ह. केहू कहता की छठ ग्लोबल हो गईल बा त केहू कहता की लोकल हो गईल बा. जौन चीज एक जगह से चारू ओर धूमधाम से फ़ैल जा ओके का कहल जाई.

कांच बांस के बंहगी खोजते रही गईली कहीं देखे के ना मीलल .जबसे छठी देख तानी तबसे आजु    ले कब्बो ना देखलीं . हाँ ई जरूर देखली कि नया नया दौउरी चाहे उ बॉस के होखे चाहे मूंज के होखे. मूड़ी ( सिर ) पर रखिके घाट पर पहुंचा दिहल जात बा. एतनी घरी मोटर साईकिल के ज़माना बा ओही पर बैठी के कान्हे पर दौरी भी चली जात बा ऊखियो चली जाता आ ब्रतधारियो चली जा तारी.

त लोकगीतन में अब ईहू कुल के जिक्र होखे  के चाहीं  तबे नू   नवको ज़माना के जानकारी होई. अब कार वाला गाना ना होई त काम कैसे चली. अब त कार से घाट पर जाता लोग.

नदी, पोखरा, तालाब, गड़ही, तुरंता घाट आ कठौता घाट सब चलता . मन चंगा त कठौती में गंगा.


  

शनिवार, 13 नवंबर 2010

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